इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चहिये।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चहिये।
हर गली, हर मोहल्ले, हर चौराहे पर..... ,
हाथ लहराती हुई हर लाश चलनी चाहिये।
आज यह दीवार पत्ते की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिये।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही...... ,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये.........॥
---------- दुष्यन्त कुमार

5 comments:
बहुत अच्छा, लगे रहो एक दिन अवश्य सफलता मिलेगी ।
good going keep it on
keep it on.good starting
मैं एकबार फिर से इस पर कमेण्ट करना चाहती हूँ,क्योंकि ये मेरी पसंदीदा कविताओं में से एक है,इस प्रकार की कविताओं को लिखते रहिए,आपका कार्य सराहनीय है॥
ब्लाग बनाया है तो लिखते भी रहिये।
Post a Comment