Wednesday, October 29, 2008

आग़ जलनी चाहिये

हो चुकी है पीर पर्वत सी, पिघ़लनी चहिये,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चहिये।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चहिये।
हर गली, हर मोहल्ले, हर चौराहे पर..... ,
हाथ लहराती हुई हर लाश चलनी चाहिये।
आज यह दीवार पत्ते की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिये।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही...... ,

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये.........॥

---------- दुष्यन्त कुमार

5 comments:

Manishanker Dwivedi said...

बहुत अच्छा, लगे रहो एक दिन अवश्य सफलता मिलेगी ।

shashi singh said...

good going keep it on

devalina said...

keep it on.good starting

shashi singh said...

मैं एकबार फिर से इस पर कमेण्ट करना चाहती हूँ,क्योंकि ये मेरी पसंदीदा कविताओं में से एक है,इस प्रकार की कविताओं को लिखते रहिए,आपका कार्य सराहनीय है॥

shashi singh said...

ब्लाग बनाया है तो लिखते भी रहिये।