Saturday, November 1, 2008

भर्तृहरि का नीतिशतकम्

येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः ,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
= मूर्ख पद्धति ( नी० श० १४ )

** जिन लोगों के पास न विद्या है, न तप है, न दान है, न ज्ञान है, न सदाचार, न गुण है और न धर्म है वे इस मृत्युलोक में पृथिवी पर भारस्वरूप हैं और मानों मनुष्य रूप में पशु ही घूम रहे हैं ।

साहित्य-सङ्गीत-कलाविहीनः ,
साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः ।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः ,
तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥
= मू० प० (नी० श० १३)

** साहित्य संगीत और कला से रहित व्यक्ति पूँछ, सींग से रहित साक्षात् पशु ही है । तिनके न खाता हुआ भी वह जीवित रहता है, वह पशुओं का परम सौभाग्य ही है, (क्योंकि यदि मनुष्य रूपी पशु भी तिनके खाने लग जाता तो निश्चय ही पशुओं के लिए खाद्य पदाथों का अभाव हो जाता ) ।

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः
नवाम्बुभिर्भूमि विलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरषा समृद्धिभिः
स्वभाव एषैव परोपकारिणाम् ॥
= नी० श० ७४ ।
** पेड़ फलों के आने से विनम्र हो जाते हैं, बादल नये जलों से और अधिक पृथ्वी पर झुक जाते हैं, सज्जन सम्पन्नता से अहंकाररहित हो जाते हैं । वस्तुतः यह परोपकारियों का स्वभाव ही होता है ।

Friday, October 31, 2008

आदमी

ज़नरल, तुम्हारा टैंक एक मजबूत वाहन है
वह मटियामेट कर डालता है जंगल को
और रौंद डालता है सैंकड़ों आदमियों को
लेकिन उसमें एक नुक्स है
उसे एक ड्राइवर चाहिये,

जनरल, तुम्हारा बमवर्षक मज़बूत है
वह तूफान से तेज उड़ता और ढ़ोता है
हाथी से भी अधिक
लेकिन उसमें एक नुक्स है
उसे एक मिस्त्री चाहिये,

ज़नरल, आदमी कितना उपयोगी है
वह उड़ सकता है और मार सकता है,
लेकिन उसमें एक नुक्स है
वह सोच सकता है !!!
--बर्सोल्त ब्रेख्त

मिलन-विरह

मिलन स्वप्न है विरह जागरण,
मैं अंजान दिशा से आया,
प्रेम-दान पाकर हरषाया,
आज विरह की वेला में फिर
छा रहा प्राणों पर मोह आवरण,
मिलन स्वप्न है विरह जागरण॥
--- shivlochan

Wednesday, October 29, 2008

उजाला बंदी है

चंद मछेरों ने साज़िश कर सागर की संपदा चुरा ली,
कांटों ने माली से मिलकर फूलों की कुर्की करवा ली,
खुशियों की हड़ताल हुई है, सुख की तालाबंदी है.....
आने को आई आज़ादी, मगर उजाला बंदी है ॥

आग़ जलनी चाहिये

हो चुकी है पीर पर्वत सी, पिघ़लनी चहिये,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चहिये।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चहिये।
हर गली, हर मोहल्ले, हर चौराहे पर..... ,
हाथ लहराती हुई हर लाश चलनी चाहिये।
आज यह दीवार पत्ते की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिये।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही...... ,

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये.........॥

---------- दुष्यन्त कुमार

Saturday, October 4, 2008

pankti ke log

पंक्ति में सामने खड़े कुछ लोग नंगे हो चुके हैं,
कुछ लोग पीछे की कतार में खड़े शर्मा रहे हैं।
चुल्लू भर भी पानी मयस्सर नहीं जिनको डूबने के लिये,
वो भी खड़े-खड़े समन्दर का पता बतला रहे हैं ।