येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः ,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
= मूर्ख पद्धति ( नी० श० १४ )
** जिन लोगों के पास न विद्या है, न तप है, न दान है, न ज्ञान है, न सदाचार, न गुण है और न धर्म है वे इस मृत्युलोक में पृथिवी पर भारस्वरूप हैं और मानों मनुष्य रूप में पशु ही घूम रहे हैं ।
साहित्य-सङ्गीत-कलाविहीनः ,
साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः ।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः ,
तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥
= मू० प० (नी० श० १३)
** साहित्य संगीत और कला से रहित व्यक्ति पूँछ, सींग से रहित साक्षात् पशु ही है । तिनके न खाता हुआ भी वह जीवित रहता है, वह पशुओं का परम सौभाग्य ही है, (क्योंकि यदि मनुष्य रूपी पशु भी तिनके खाने लग जाता तो निश्चय ही पशुओं के लिए खाद्य पदाथों का अभाव हो जाता ) ।
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः
नवाम्बुभिर्भूमि विलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरषा समृद्धिभिः
स्वभाव एषैव परोपकारिणाम् ॥
= नी० श० ७४ ।
** पेड़ फलों के आने से विनम्र हो जाते हैं, बादल नये जलों से और अधिक पृथ्वी पर झुक जाते हैं, सज्जन सम्पन्नता से अहंकाररहित हो जाते हैं । वस्तुतः यह परोपकारियों का स्वभाव ही होता है ।
Saturday, November 1, 2008
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